नीला नगर: जोधपुर
मरुस्थल की गोद में बसा, एक सपना नीला, प्यारा,
जहाँ हवा में रेत घुले, सूरज भी मुस्काए सारा।
नीली दीवारों के पीछे, इतिहास की गूँज सुहानी,
हर मोड़ पे गाता कोई, राजाओं की अमर कहानी।
मेहरानगढ़ की ऊँची चोटी, बोले शौर्य और अभिमान,
जहाँ तलवारें सो गईं, पर जिंदा है सम्मान।
किले की दीवारों पर सूरज, बिखराए केसरिया रंग,
हर पत्थर में गूँज उठे, रणभेरी के दृढ़ स्वर संग।
घंटाघर की चहल-पहल में, महके मसालों की बात,
सदियों पुरानी गलियों में, गूँजे हँसी की सौगात।
जसवंत थड़ा का सन्नाटा, जैसे कविता कोई अधूरी,
पत्थरों में भी धड़कन सुनो — ये विरासत है जरूरी।
उमैद भवन के आँगन में, झलके राजसी रवानी,
जहाँ समय भी ठहर गया, देख उसकी नादानी।
नीला नगर जोधपुर मेरा, सूरज की शान निराली,
धूप में नहाया इतिहास, रेत में झिलमिल लाली।
नीली छतों से झाँकें सपने, जैसे नभ उतर आए,
हर संध्या घुल जाए मन में, जब दीपक घर-घर जल जाए।
यह शहर नहीं, एक राग है — प्रेम, गौरव और श्रृंगार,
जोधपुर की मिट्टी में बसता, भारत का आत्मा-संसार।
– मीनाक्षी सिंह

Comments
Post a Comment