उदयपुर: झीलों की नगरी


झीलों की गोद में बसा, स्वप्निल नगर उदयपुर,
शांत लहरों पर झलकता, इतिहास का सुंदर सुर।


पिचोला की लहरों में, महलों का प्रतिबिंब,

संगमरमर की छटा से, जगमगाता हर चित्र।


सिटी पैलेस की बालकनी, गगन को छूती शान,

राजसी ठाठ बयां करती, वीरों की अमर पहचान।


फतेहसागर की ठंडी बयार, मन को छू जाए,

नीमच माता की पहाड़ियों से, सूरज हँसता आए।


सज्जनगढ़ का मोती महल, बादलों में खो जाए,

मानो कोई परी लोक, नभ से धरा पर आए।


गुलाब बाग की पगडंडी, महकती हर राह,

साँझ ढले दीपों से, जगमग होती चाह।


कुम्भलगढ़ की दीवारें कहें, वीरों की वो गाथा,

हल्दीघाटी की धरा सुने, रणबांकुरों की कथा।


झीलों की ये नगरी, प्रकृति संग इतिहास का मेल,

उदयपुर है राजसी रत्न, अनमोल, अद्वितीय, अवेल।

   

                                                   — मीनाक्षी सिंह

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