दार्जिलिंग: धुंध में लिपटा स्वर्ग
जहाँ बादल करते शरारत, छू जाते हर ठिकाना।
सर्द हवाओं की फुसफुस में, कोई राग सुनाई देता,
चाय की खुशबू में घुला, प्रकृति का मधुर गीत बहता।
टॉय ट्रेन की सीटी बोले, जैसे कोई बाल कहानी,
घुमावदार पटरियों पर चलती, मुस्कान लिए रवानी।
नीले आसमान के नीचे, सूरज छूता हिमालय,
जहाँ हर सुबह लाती है, मन में नया उजियालय।
कंचनजंघा की चोटी पर, सुनहरी किरणें उतरें,
धरती जैसे पूज रही हो, नभ के पवित्र सवेरे।
मठों में बजती घंटियाँ, गूँजें शांति के सुर प्यारे,
मन को सिखाएँ मौन की भाषा, जीवन के सहारे।
रात ढले जब दीप झिलमिल, तारों से हो संवाद,
धुंध के आँचल में छिपे, सपनों की मिले फरियाद।
हर पगडंडी कहती कहानी, सादगी की मिसाल,
दार्जिलिंग — वो ठौर जहाँ, ठहर जाए हर ख्याल।
– मीनाक्षी सिंह

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