हैदराबाद: दिलकश यादों का शहर
मोती की झील के आँचल पर,
जब शाम ढले अरमानों सी—
हल्की-सी बयारों में घुलती,
एक नज़र आती है फ़सानों सी।
चारमीनार की छाया गहरे,
रातों का काजल बन जाती,
चाँद का टुकड़ा चुपके-चुपके
मीनारों पर ही मुस्काती।
लाड़-प्यार की वो बोली मीठी,
दक्खिनी रंगों में घुल जाती,
हर गली-कूचे में जैसे
मेहमाननवाज़ी गुनगुनाती।
बिरयानी की खुशबू उड़ती—
यादों की पोटली भर जाती,
एक कौर में ही लगता जैसे
सदियों की गलियाँ चल जाती।
गोलकोंडा की दीवारों में
वीरों की प्रतिध्वनि जागे,
हर पत्थर जैसे कहता हो—
“हमने समय को भी देखा आगे।”
ओसमानिया की रूह पुरानी,
आईटी की रफ्तार नई,
इक शहर में दो जमानों की
कितनी अनोखी, प्यारी घड़ी।
और दिल की तह तक उतर कर,
हैदराबाद यूँ बस जाता—
पहली मुलाक़ात में ही जैसे
अपना-सा एहसास दिलाता।
— मीनाक्षी सिंह

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