कच्छ: रंग, रण और राग


सूरज की पहली सुनहरी लपट,

जब रण के सीने को छू जाती है,

नमक के खुले महासागर में

चाँदी-सी चमक बिखर जाती है।


श्वेत धरा पर हवा की सरगम,

रेत का हर कण गीत सुनाए;

दूर-दूर तक फैला सन्नाटा

अपनी ही भाषा में कुछ कह जाए।


कच्छ की रातें तारे बुनतीं,

मानो आकाश झरने लगता हो;

रंगोली-सा बिखरा अम्बर

धरती पर उतरने लगता हो।


भुज की गलियों में इतिहास

धीमे-धीमे सुरों में गाता है;

कच्छी कढ़ाई का अद्भुत रंग

दिल को सपनों से सजाता है।


कच्छ की ऊँट-गाड़ी की ताल,

गूँज उठे जैसे कोई पुकार;

लोकगीतों के मधुर तराने

रेगिस्तान को दे दें प्यार।


रणोत्सव का रंग निराला,

दुनिया को अपनी ओर बुलाए;

सफ़ेद रण में नृत्य की लय

हर दिल में उजाला फैलाए।


जहाँ सूरज ढले, तो क्षितिज

सिंदूरी चुनरी-सा लगने लगता है;

कच्छ की मिट्टी का हर एक कण

अपनी कहानी स्वयं रचता है।

 

                      — मीनाक्षी सिंह 



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