बोधगया: ज्ञान की पावन भूमि
शांत हवा में गूँजते, प्राचीन समय के स्वर,
जहाँ बुद्ध ने पाया था, आत्मज्योति का अमर असर।
उस पीपल के छाँव तले, सत्य का दीप जला,
अंधियारे मन में धीरे-धीरे, जागरण का प्रभात खिला।
निर्वाण की उस धरती पर, कदम रखते ही लगे,
मानो समय ठहर गया हो, सौम्यता के रंग भरे।
महाबोधि का स्तूप खड़ा, गंभीर, गौरवमय,
हर पत्थर में लिखी कहानी, करुणा की अमिट लय।
सरयू सी प्रवाहित शांति, मन के भीतर उतरती,
ध्यान की मधुर सुवास वहाँ, थकी आत्मा को संवरती।
घंटियों की शीतल धुन, आशीषों सा बहती जाए,
चरणों में बैठे साधुजनों की प्रार्थनाएँ मन को भाए।
मृदुल धूप की चादर में, श्रद्धा का आलोक छलकता,
हर आगंतुक के हृदय में, एक नया संकल्प पनपता।
वहीं बुद्ध की वाणी जैसे, अब भी कानों में गूँजे,
बोधगया की पावन धरती पर, हर क्षण मन शांति में डूबे।
— मीनाक्षी सिंह

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