हम्पी : पत्थरों में बसता शाश्वत समय


पत्थरों में कैद है कोई प्राचीन स्वप्न,

हम्पी की धरती पर समय ठहरा-सा लगता है।

टूटे हुए स्तंभ, बिखरे हुए शिखर,

हर खंडहर में इतिहास साँस लेता है।


तुंगभद्रा की लहरों में गूँजती है कथा,

राजाओं के वैभव और संतों की साधना।

वीरता की तलवार, भक्ति का वीणा-नाद,

यहाँ हर कण में बसता है आत्मा का संवाद।


सूरज जब चट्टानों को सोने सा रंग देता है,

तो मौन भी कविता बनकर उतर आता है।

हवा फुसफुसाती है विजयनगर का गौरव,

जो टूटकर भी आज अमर कहलाता है।


न कोई ताज, न सिंहासन की चाह,

फिर भी सम्राट है यह उजड़ा हुआ नगर।

क्योंकि जो समय को देख चुका हो नज़दीक से,

वही सिखा सकता है शाश्वत होने का असर।


खंडहर नहीं, यह स्मृतियों का तीर्थ है,

जहाँ पत्थर भी मौन होकर सत्य कहते हैं।

हम्पी सिखाती है—नाश में भी निहित है सृजन,

और मिटकर ही सभ्यताएँ अमर बनते हैं।


                                 — मीनाक्षी सिंह 



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