ऊटी: सुकून का पहाड़ी एहसास


नीली पहाड़ियों की गोद में सोया,

बादलों से लिपटा एक सपना—ऊटी।

चाय की पत्तियों पर ठहरी ओस,

हर बूँद में प्रकृति की कविता घुली।


देवदारों की सरसराहट में

हवा कोई पुराना गीत गुनगुनाए,

कोहरे की चादर ओढ़े सुबह

धीरे-धीरे सूरज को बुलाए।


झील की सतह पर थिरकती रोशनी,

जैसे चाँदी ने आईना धर लिया हो,

हर लहर में एक खामोश वादा—

कि सुकून यहीं कहीं ठहरा हो।


फूलों की खुशबू, मिट्टी की महक,

मन से थकान चुपचाप चुरा ले,

ऊटी की इन शांत गलियों में

दिल फिर से खुद को पा ले।


यह शहर नहीं, एहसास है कोई,

जो शोर से दूर बुलाता है,

ऊटी — जहाँ प्रकृति

इनसान को फिर से इंसान बनाता है।


                          — मीनाक्षी सिंह 



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