सिक्किम: शांति का हिमालयी स्वप्न


हिमालय की गोद में सोया एक स्वप्न,

बर्फ़ीली चोटियों पर सुनहरी धूप का अंक।

मेघों की चादर ओढ़े वादियाँ मुस्काएँ,

सिक्किम की धरती मन को शांति सिखाए।


कंचनजंघा की चोटी, जैसे देवों का ताज,

गंगटोक की गोद में गूंजे प्रकृति का साज।

तीस्ता की धारा गुनगुनाती गीत पुराना,

हर लहर में बसता है जीवन का तराना।


रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज हवा में लहराएँ,

बौद्ध मंत्रों की गूंज से मन शुद्ध हो जाए।

मठों की घंटियाँ कहती हैं धीरे-धीरे,

शांति ही सबसे सुंदर सत्य है इस धरे।


हरे-भरे वन, ऑर्किड की खुशबू में भीगे,

पथरीले पथ पर चलते स्वप्न नए-नए सीखे।

सरल जन-जीवन में छिपा सच्चा सा आनंद,

सिक्किम सिखाए—प्रकृति संग ही है जीवन का संबंध।


जहाँ समय भी ठहरकर साँस लेना चाहे,

हर क्षण में प्रकृति अपना रहस्य बताए।

मन लौटे वहाँ से कुछ और निर्मल बनकर,

सिक्किम बस जाए हृदय में, एक शांत मंदिर बनकर।


                                              — मीनाक्षी सिंह 




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