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Showing posts from December, 2025

हम्पी : पत्थरों में बसता शाश्वत समय

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पत्थरों में कैद है कोई प्राचीन स्वप्न, हम्पी की धरती पर समय ठहरा-सा लगता है। टूटे हुए स्तंभ, बिखरे हुए शिखर, हर खंडहर में इतिहास साँस लेता है। तुंगभद्रा की लहरों में गूँजती है कथा, राजाओं के वैभव और संतों की साधना। वीरता की तलवार, भक्ति का वीणा-नाद, यहाँ हर कण में बसता है आत्मा का संवाद। सूरज जब चट्टानों को सोने सा रंग देता है, तो मौन भी कविता बनकर उतर आता है। हवा फुसफुसाती है विजयनगर का गौरव, जो टूटकर भी आज अमर कहलाता है। न कोई ताज, न सिंहासन की चाह, फिर भी सम्राट है यह उजड़ा हुआ नगर। क्योंकि जो समय को देख चुका हो नज़दीक से, वही सिखा सकता है शाश्वत होने का असर। खंडहर नहीं, यह स्मृतियों का तीर्थ है, जहाँ पत्थर भी मौन होकर सत्य कहते हैं। हम्पी सिखाती है—नाश में भी निहित है सृजन, और मिटकर ही सभ्यताएँ अमर बनते हैं।                                    — मीनाक्षी सिंह 

पुदुचेरी: सागर, शांति और रंग

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  नीले सागर के तट पर बसी, शांति की यह बस्ती, फ्रेंच गलियों में गूँजती, समय की मधुर मस्ती। दीवारों पर रंगों का मेल, गुलाबी, पीला, नीला, हर मोड़ पे जैसे कहे — “जीवन है यहाँ रंगीला।” नारियल की छाँव तले, धीमे-धीमे चलती बयार, लहरों के संग गुनगुनाता, मन का हर एक तार। कैफ़े की महक, कॉफ़ी की बात, समुद्र की लय में डूबा हर रात। ऑरोविल के वृक्षों तले, स्वप्नों की एक नगरी है, जहाँ शांति कोई शब्द नहीं, पर साँसों में उतरी है। सुनहरी रेत पे चलते पाँव, छोड़ें स्मृतियों के निशान, हर सुबह यहाँ लिखती नई, जीवन की मुस्कान। यहाँ सूरज ढले तो लगता, समय ठहर-सा जाए, क्षितिज पे फैलती किरणें, मन को छूती जाएँ। पुदुचेरी — सागर, शांति, और कला का संगम प्यारा, हर दिल यहाँ बन जाता है — एक छोटा-सा किनारा।                                               — मीनाक्षी सिंह 

केरल की छवि

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कोच्चि की गलियों में बसी खुशबू पुरानी, समुद्र की लहरों में झलके सपनों की कहानी। अल्लेप्पी की नहरें, पानी में तैरते घर, हर मोड़ पर बसी शांति, हर किनारे पर पहर। कुमारकोम की झीलें, कमल खिले सिरहाने, सूरज की किरणें नहाएं पानी में जाने। तिरुवनंतपुरम की महिमा, मंदिरों की रौनक, धर्म और संस्कृति में बंधा हर दिल का कोना। मुन्नार की पहाड़ियों पर हरी चाय की चादर, कोहरे में छुपा हर सूरज का नयापन, अद्भुत अहसास का स्वाद। केरल की सुंदरता, रंगों का अनमोल मेला, हर जगह, हर पल, बस प्रेम का ही खेला।                                               — मीनाक्षी सिंह 

सिक्किम: शांति का हिमालयी स्वप्न

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हिमालय की गोद में सोया एक स्वप्न, बर्फ़ीली चोटियों पर सुनहरी धूप का अंक। मेघों की चादर ओढ़े वादियाँ मुस्काएँ, सिक्किम की धरती मन को शांति सिखाए। कंचनजंघा की चोटी, जैसे देवों का ताज, गंगटोक की गोद में गूंजे प्रकृति का साज। तीस्ता की धारा गुनगुनाती गीत पुराना, हर लहर में बसता है जीवन का तराना। रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज हवा में लहराएँ, बौद्ध मंत्रों की गूंज से मन शुद्ध हो जाए। मठों की घंटियाँ कहती हैं धीरे-धीरे, शांति ही सबसे सुंदर सत्य है इस धरे। हरे-भरे वन, ऑर्किड की खुशबू में भीगे, पथरीले पथ पर चलते स्वप्न नए-नए सीखे। सरल जन-जीवन में छिपा सच्चा सा आनंद, सिक्किम सिखाए—प्रकृति संग ही है जीवन का संबंध। जहाँ समय भी ठहरकर साँस लेना चाहे, हर क्षण में प्रकृति अपना रहस्य बताए। मन लौटे वहाँ से कुछ और निर्मल बनकर, सिक्किम बस जाए हृदय में, एक शांत मंदिर बनकर।                                                 — मीनाक्षी सिंह 

Christmas Song

 

Durga Maa Bhajan

 

Hindi Song

 

कूर्ग: हरियाली की आत्मा

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पश्चिमी घाट की गोद में सोया है कूर्ग, धुंध की चादर ओढ़े, सपनों सा अनमोल कूर्ग। कॉफी की खुशबू में घुली है सुबह की बात, हर पत्ता यहाँ गुनगुनाए प्रकृति का गीत साथ। झरनों की हँसी बहती है पत्थरों के संग, बादल छूते हैं पहाड़, नभ से करते हैं ढंग। मिट्टी की सोंधी महक में बसी है कहानी, हर राह सुनाए शांति की मीठी निशानी। हरे-भरे जंगलों में समय ठहर सा जाए, पक्षियों के सुरों में मन अपना घर पाए। नदियाँ कहें रहस्य, घाटियाँ लें साँस, कूर्ग में हर पल है प्रकृति का विश्वास। यहाँ की हवा में है सुकून का स्पर्श, थकन को हर ले जाए, मन करे निर्मल वर्ष। कूर्ग—हरियाली की आत्मा, मौन का उजास, जहाँ दिल बन जाता है, स्वयं प्रकृति का निवास।                                             — मीनाक्षी सिंह 

ऊटी: सुकून का पहाड़ी एहसास

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नीली पहाड़ियों की गोद में सोया, बादलों से लिपटा एक सपना—ऊटी। चाय की पत्तियों पर ठहरी ओस, हर बूँद में प्रकृति की कविता घुली। देवदारों की सरसराहट में हवा कोई पुराना गीत गुनगुनाए, कोहरे की चादर ओढ़े सुबह धीरे-धीरे सूरज को बुलाए। झील की सतह पर थिरकती रोशनी, जैसे चाँदी ने आईना धर लिया हो, हर लहर में एक खामोश वादा— कि सुकून यहीं कहीं ठहरा हो। फूलों की खुशबू, मिट्टी की महक, मन से थकान चुपचाप चुरा ले, ऊटी की इन शांत गलियों में दिल फिर से खुद को पा ले। यह शहर नहीं, एहसास है कोई, जो शोर से दूर बुलाता है, ऊटी — जहाँ प्रकृति इनसान को फिर से इंसान बनाता है।                           — मीनाक्षी सिंह 

ছায়ার খেলা (The Game of Shadows)

Act 1: ছায়ার আগমন (Arrival of Shadows) Setting:  Kolkata (India)  • Nisha Bagchi begins to sense strange disturbances within the family mansion—fleeting shadowy figures and unsettling whispers in the night. • Her love interest, Anurag Mitra, dismissive of her concerns, attributes them to her imagination but remains protective of her. • Jayabrato Bagchi, Nisha's father, grows increasingly concerned for her safety and urges caution in the face of these unsettling events. • Nidhi Bagchi, Nisha's mother, delves into the mansion’s dark past, uncovering vague references to unexplained deaths and mysterious occurrences. • Shyamal Ghosh, a restless spirit, subtly manipulates the shadows around the mansion, testing the family’s fear thresholds. • Inspector Biswajit Mondal investigates a series of strange disappearances in Kolkata, finding faint connections to the mansion’s sinister history. • In the city, shadows begin to behave unnaturally—streetlights flicker erratically, and object...