नवंबर की रौनक, कोलकाता
नवंबर की धूप में शहर कुछ और निखर जाता है,
कोलकाता की गलियों में सुकून उतर आता है।
हल्की-सी ठंड में लिपटी स्मृतियों की महक,
हर मोड़ पर बिखेर जाती है बीते कल की झलक।
हावड़ा पुल पर ठिठकी-सी शाम उतर आती है,
गंगा के जल में आसमान की लाली झिलमिलाती है।
ट्राम की घंटी में बसी हैं बीती सदियों की बातें,
हर आवाज़ सुनाती है समय की सौम्य मुलाक़ातें।
कॉफ़ी हाउस की मेज़ों पर बहसों का उजाला,
कविताओं में सिमटा कोई भूला-बिसरा हवाला।
रवीन्द्र की तानों-सा बहता है मन का राग,
हर शब्द में संस्कृति का अनमोल अनुराग।
दुर्गा पूजा की गूंज अभी हवाओं में ठहरी,
सिंदूर की खुशबू में यादें अनकही-सी बिखरी।
नवंबर की रौनक में कोलकाता गुनगुनाता जाए,
समय थम-सा जाए, और आत्मा घर लौट आए।
— मीनाक्षी सिंह

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