शिमला की मई की सुबहें
मई की सुबहें शिमला में
ओस की चुपचाप मुस्कान हैं,
देवदारों की ऊँची बाँहों में
लिपटी धूप की पहचान हैं।
पहाड़ों की नींद खुलती है
हल्की-सी ठंडी साँसों से,
बादल उतर आते हैं छूने
छतों को अपने आँचल से।
घाटियों में चाय की खुशबू
हवा से धीरे कह जाती है,
हर खिड़की से झाँकती उम्मीद
दिन भर की कथा सुनाती है।
सूरज सुनहरी पगडंडी पर
धीरे-धीरे चलता जाए,
बर्फ़ की यादों को सीने में
हरियाली नया गीत गुनगुनाए।
मई की सुबहें शिमला की
मन में शांति भर जाती हैं,
भागती दुनिया से कुछ पल
हमें चुपचाप बचा लाती हैं।
— मीनाक्षी सिंह

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