काशी की गाथा


गंगा की गोद में बसी, ज्योतिर्मयी नगरी,

विश्वनाथ मंदिर से शोभित पावन डगरी।

मंत्रों की प्रतिध्वनि से भर उठे आलोक,

यहाँ हर कण में बसता है शिव का संयोग।


मणिकर्णिका की ज्वाला, जहाँ शाश्वत जलती,

मृत्यु भी अमरत्व की बाहों में पलती।

दीपों की पंक्तियाँ घाटों पर जगमगाएँ,

गंगा की लहरें आरती संग मुस्काएँ।


शिव की डमरू-ध्वनि में समय ठहर जाता,

हर श्वास, हर धड़कन शिवत्व गुनगुनाता।

संकरी गलियों में मंदिरों की कतार,

घंटों की गूंज से मिटता है संसार।


सारनाथ की वाणी, शांति का संदेश,

ज्ञान की गूँज में मिलता जीवन-विशेष।

बनारसी पान की मिठास, साड़ी की शान,

ठुमरी और तान में खिल उठे जहान।


भांग की मस्ती, लोकगीतों का रंग,

हर दिल में गूंजे जीवन का उमंग।

हे काशी! तेरा वैभव अनंत, अपार,

तू मोक्ष का द्वार, तू जीवन का सार।


हर यात्री यहाँ आकर स्वयं को पा ले,

गंगा की धार में बहकर शिव से मिल जाए।


                                   — मीनाक्षी सिंह  


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