कोलकाता: आनंद का नगर
हुगली के तट पर बसा, स्वप्नों का संसार,
कला, साहित्य, संगीत में, जिसका अपार विस्तार।
हावड़ा ब्रिज की बाहों में, धड़कता है हर दिल,
यहाँ की गलियों में छुपा है, इतिहास का हासिल।
दक्षिणेश्वर के आँगन में, माँ काली का वास,
कालीघाट की घंटियाँ गूंजें, मिटा दें सबका त्रास।
दुर्गा पूजा की रौनक, जगमगाती हर गली,
माँ के स्वागत में नाच उठे, आनंदित हर कली।
विक्टोरिया मेमोरियल की श्वेत, गाथाएँ कहती ईंट,
रवीन्द्रनाथ की कविता-सी, हर बयार में तिन्त।
इंडियन म्यूज़ियम की छाँव में, अतीत सजता है,
साइंस सिटी की राहों पर, भविष्य बसता है।
रसगुल्ले की मिठास यहाँ, मिस्टी दोई का प्यार,
काठी रोल, फुचका संग, बिखरे स्वाद अपार।
कॉफी हाउस की गूँजती बातें, यादों का विस्तार,
हर मोड़ पे बिखरा मिलता, अपनापन अपार।
कोलकाता है जादू, है रंगों की उड़ान,
हर दिल को देता है, खुशियों का वरदान।
ये शहर नहीं, एक कविता है,
जो गुनगुनाती है—“आनंद ही जीवन का विधान।”
— मीनाक्षी सिंह

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