आगरा की शान


शब्दों में कैसे कहूँ, वो ताज की बात,

संगमरमर में छुपी है मुहब्बत की सौगात।

यमुना के तट पर खड़ा, सपनों सा सफ़ेद ताज,

जहाँ हर दिल पढ़ता है इश्क़ का ताजमहल राज़।


शाहजहाँ ने रच दिया था प्यार का वो गीत,

जिसमें हर पत्थर बोलता है मुमताज़ का प्रीत।

वो नज़ारे, वो नक्श, वो बेआवाज़ बातें,

कहते हैं आज भी, वो मोहब्बत की सौगातें।


मुग़ल सल्तनत की आन-बान थी ये ज़मीं,

जहाँ से चली थी शाही तहज़ीबों की नर्मी।

आगरा का किला, गवाही देता हर दीवार,

जहाँ इतिहास ने रचे थे जज़्बात के कई उपहार।


मीना बाज़ार की चहल-पहल, पेठे की मिठास,

हर गली में बसी है सदियों की कोई खास बात।

फतेहपुर सीकरी की खामोश दीवारें कहती हैं,

अकबर की सोच, धर्म की राह को सहती हैं।


यहाँ हवाओं में गूंजते हैं बादशाहों के गीत,

ताज के साए में अब भी बहता है प्रीत।

वास्तुकला की मिसाल, संस्कृति का अद्भुत मेल,

आगरा का सौंदर्य है, काल से भी खेल।


मगर यथार्थ की भी है अपनी सदा,

भीड़ और कोलाहल में छुप जाती वो अदा।

परंपरा और प्रगति में चल रही है होड़,

फिर भी ताज बना है मोहब्बत का सिरमौर।


शाहजहाँ की आँखों में जो सपना था समाया,

मुमताज़ के बिना जो दिल ने कभी चैन न पाया।

उस प्यार को पत्थरों में अमर कर दिया,

एक मकबरे में पूरी सदी को भर दिया।


                               — मीनाक्षी सिंह 

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